मुनि श्री का जीवन परिचय

"मन मंदिर मे आन बसे सौरभ सागर महाराज
धर्म की राह दिखा दई और सवारे काज
ऐसे गुरू का यदि रहे भक्त के सिर पर हाथ
रोक शोक सब दूर रहे सुख की हो बरसात"
सौरभ सागर गुरू हमारे भक्तो के सब कष्ट निवारे।
ये गुरूवर है अंतर्यामी मन की सारी बाते जानी।
मन मोहक मुस्कान तुम्हारी छवि तुम्हारी है मनोहारी
चंद्रप्रभा जी की कोख मे आये शुभ लंक्षण उनको दर्शाए
उगता हुआ एक सुरज देखा सर्पों का इक जोड़ा देखा
एक जंगल मे आग भी देखी हाथी की इक जोड़ी देखी
श्रीपाल जी को स्वप्न बताये फल जाना तो बहुत हरषाए
पुत्र रत्न इक घर आयेगा दावानल सा यश पायेगा
मस्त हस्त सम भ्रमण करेगा सुरज सम जग मे चमकेगा
बाबा की ऑखो का तारा सुरेन्द्र नाम लगता था प्यारा
गुरू पुष्प संघ जसपुर आया इस बालक का भाग्य जगाये
अदभुत प्रतिभा देखी तुझमे, ज्ञान योगी इक छिपा था तुझमे
पिता से तुमको माँग लिया था मात पिता ने सह़र्ष दिया था
तब अग्नी मे तुम्हें तपाया बारह वर्ष का समय बिताया
क्षमावाणी का शुभ दिन आया दीक्षा धारू ये था भाया
21सितंबर दिन पुण्यशाली होती गुरू की होती दीक्षा दिवाली
चहुं दिशि अंबर बने तुम्हारे वीतराग मुद्रा जब धारे
वाणी तेरी शीतल चंदन शीघ्र मिटाती मन का क्रंदन
जिस नगरी भी कदम बढाये अतिशय अपने खूब दिखाये
घर्म की ऐसी अलख जगायी संस्कार प्रणेता उपमा पायी
जेल मे जो उपदेश सुनाये मध माँस से लोग छुङाये
जब बच्चे उपदेश है सुनते शहद ब़्रेड व चमडा तजते
जिस नगरी भी किया चौमासा भक्तो के मन भर दी आशा
निर्बल तुझसे बल पा जाये वीराने हरियाली पाये।
जंगल मे मंगल करते हो संकट सारे तुम हरते हो।
जिस पर होती कृपा तुम्हारी उसकी तो किस्मत है संवारी
एक प्रेरणा तुमसे पायी सौरभाँचल की नींव धराई
सौरभाँचल इक तीरथ प्यारा नव जिन गृह का देख नजारा
वृहद आदि पदमासन प्रतिमा नीलाँबर का लगा चदोंवा
श्रुत स्कन्ध मंदिर बनवाया दाँदशाग का मान बढ़ाया
रत्न चौबीसी मन को भाये देख देख के ह्रदय हरसाये
सूनी थी हिसार की नशिया पर भू भीतर दबी थी निधिया
अपने ज्ञान ध्यान से जाना त्रय जिनदेवा भीतर जाना
हाथों से मिट्टी खुदवायी पार्श्व आदि वीरा छवि पायी
जयकारो से गगन गुजाये ज्ञान योगी गुरुदेव कहाये
मन हर पारस क्षेत्र कहाया सहृस कलश से नवहन कराया
जिस धरती पर कदम बढाये वो माटी चंदन बन जाये
घर घर ज्ञान के दीप जलाये अज्ञान तिमिर मन का हट जाये
दर्शन पा मन पुष्प खिला है वर्धमान सा दर्श मिला है
जब से तेरा साथ मिला है हम सब को भगवान मिला है।
"सौरभ सागर चालीसा मन जो भी धयाये
त्याग धर्म बढ़ता रहे गुरू अनुकम्पा पाये
गुरूवर तेरे चरण मे नमन हो बारंबार
पापो का क्षय हो मेरा भव से हो जाऊँ पार।"