मुनि श्री का जीवन परिचय

मुनि श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज

मुनि श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज का जन्म 22 अक्टूबर 1970 को नवगठित छत्तीसगढ़ प्रदेश के रायगढ़ जिले मे जसपुर नगर मे हुआ । पूर्व जन्म के संस्कार, प्रबल शुभ कर्मोदय से गुरु चरण सानिध्य मिलने से परम पूज्य आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज से प्रभावित होकर मात्र साढ़े बारह साल की छोटी सी आयु मे आजीवन गृह त्याग का संकल्प कर 8 अप्रैल 1983 को घर छोड़ दिया ।
आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने अपनी दिव्य- द्रष्टि से आपमे कुछ विलक्षणता देखी और आपकी बढ़ती वैराग्य भावना को देख सहज ही साढ़े पंद्रह वर्ष की लघु-वय मे छतरपुर ग्राम मे 17 जनवरी 1986 को क्षल्लक दीक्षा प्रदान कर दी ।
आपकी बढ़ती साधना एवं ज्ञान से राजस्थान की पावन धरा मे बागड़ प्रांत के बांसवाड़ा जिले के अंदेश्वर नमक पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र मे 27 जून 1986 को ऐल्लक दीक्षा ग्रहण कर की । सतत आठ वर्ष की कड़ी साधना के द्वारा जिनागम के रहस्यो को जानने, समझने एवं ह्रदय मे उतार गुरु आशीष की छाया मे अपनी प्रतिभा को निखारा । अंतत 21 सितंबर 1994 को उत्तरप्रदेश की धर्म नगरी इटावा मे आचार्य श्री ने आपको मुनि दीक्षा दी।
आचार्य श्री अपने ज्ञान- ध्यानी, सोम्य, शांत, मुनि को देखकर प्रसन्नचित रहते और अपने ही साथ उत्तरप्रदेश से नेपाल तक की यात्रा कराई ।
तदुपरान्त उन्होने 21 मई 1995 को यू.पी. के बाराबंकी नामक शहर से मंगलमय भरपूर आशीर्वाद प्रदान कर विदा किया । आपने धर्म प्रभावनार्थ मई-जून की भीषण गर्मी मे बांदा की और विहार किया और अपनी सूझबूझ से चारित्रिक निर्मलता से दो वर्ष की अल्पावधि मे ही बहूचर्चित हो गए।
आपने विश्व इतिहास की प्रथम घटना बांदा , शिवपुरी, आग्रा, अलीगढ़ जेल मे मंगल प्रवचन किए एवं लगभग 1600 कैदियो को मांस, अंडा, शराब आदि का त्याग कराया ।
गुरुदेव के पुनीत, पावन, पवित्र चरणों मे सादर नमन एवं नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु

जैन आचार्य श्री पुष्पदंत जी महाराज के परम शिष्य संस्कार प्रणेता श्री सौरभ सागर जी महाराज की प्रेरणा से गाज़ियाबाद मे विकलांगों के लिए सौरभ सेवा संस्थान के अंतर्गत जीवन आशा हॉस्पिटल 50 करोड़ की लागत से विस्व स्तरीय अस्पताल गाज़ियाबाद (यू.पी.) मे महाराज श्री के आशीर्वाद से बन रहा है , इसमे एक जिनालय का निर्माण भी हो रहा है जिसमे खुदाई मे मिली मंशापूरण महावीर भगवान की चमत्कारिक प्रतिमा की स्थापना की जाएगी । वर्तमान मे अस्थायी रूप मेरठ में विराजमान है ।

संक्षिप्त परिचय

जन्म : 22 अक्टूबर 1970
जन्म नाम : सुरेंद्र जैन
माता का नाम : श्रीमती चंद्रप्रभा जैन पाटनी
पिता का नाम : श्रीपाल जैन पाटनी
क्षुल्लक दीक्षा : 17/01/1986
क्षुल्लक दीक्षा स्थान : छ्तरपुर म.प्र
ऐलक दीक्षा : 27/06/1988
ऐलक दीक्षा स्थान : अंदेश्वर पारसनाथ
मुनि दीक्षा : 21 सितम्बर 1994
मुनि दीक्षा स्थान : इटावा उ.प्र
मुनि दीक्षा गुरू : परम पूज्य वात्सल्य दिवाकर आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज
श्री सौरभ सागर जी आरती

गुरु देव की मंगल आरती करे
सौरभ सागर की , ज्ञान दिवाकर की -2
आरती उतारे गुरुवर की आयो मिल के हम -2
सौरभ सागर गुरु की निरखु रे सुरतिया
मणि दीपो से गुरु की उतारू में आरातिया
ओ -ढोलक मंजीरा बाजे भाव जगाने को
पग में नुपुर झनकारे कर्म छुड़ाने को
जगमग जगमग दीप जला कर आरती गाये आओ रे
ज्ञान का भण्डार गुर्वर साथ लाये आओ रे
सौरभ सागर की ज्ञान दिवाकर की आरती उतारे गुरुवर की आओ मिल के हम .......
श्री पाल का जश बढाया जशपुर नगरी में जन्मे
तुमसा पुत्र पाकर माता चंद्रप्रभा हर्षे
चार दिशा सी सुन्दर चार बहने है पाई
साथ रहते थे हिलमिल कर सारे भाई
बचपन में पुष्प गुरु का दर्श जो पाया था
सुरेन्द्र से सौरभ बने वीतराग मन आया था
सौरभ सागर की ज्ञान दिवाकर की आरती उतारे गुरुवर की आओ मिल के हम....
पञ्च महाव्रत धारी उर में करुना समाई
दिया है ज्ञान तुमने मुक्ति की राह दिखाई
सौरभ गुरुवर का जिसने भी पाया है शरणा
मिथ्या को ताज कर पाटा है सम्यक रतना
श्रद्धा और भक्ति का दीप मन में जलाये
गुरु की आरती करके भव का तम नाश जाए
सौरभ सागर की ज्ञान दिवाकर की आरती उतारे गुरुवर की आओ मिलके हम.......
'सौरभान्चल तीर्थ' बनाकर नवग्रह कष्ट मिटाए
'जीवन आशा ' जगाकर जनजन को सुखी बनाये
संस्कारों का दीप जला कर करता मन पावन
'ज्ञानयोगी 'गुरुवर भर देता खुशियों से दामन
'मनहर पारस 'दर्श करा कर बन गये तुम मनहर
नाव 'विभा 'की पार उतारो हे !सौरभ गुरुवर
सौरभ सागर की ज्ञान दिवाकर की आरती उतारे गुरुवर की आओ मिलके हम......
||सौरभ सागर जी महाराज की जय ||

श्री सौरभ सागर जी चालीसा

"मन मंदिर मे आन बसे सौरभ सागर महाराज
धर्म की राह दिखा दई और सवारे काज
ऐसे गुरू का यदि रहे भक्त के सिर पर हाथ
रोक शोक सब दूर रहे सुख की हो बरसात"
सौरभ सागर गुरू हमारे भक्तो के सब कष्ट निवारे।
ये गुरूवर है अंतर्यामी मन की सारी बाते जानी।
मन मोहक मुस्कान तुम्हारी छवि तुम्हारी है मनोहारी
चंद्रप्रभा जी की कोख मे आये शुभ लंक्षण उनको दर्शाए
उगता हुआ एक सुरज देखा सर्पों का इक जोड़ा देखा
एक जंगल मे आग भी देखी हाथी की इक जोड़ी देखी
श्रीपाल जी को स्वप्न बताये फल जाना तो बहुत हरषाए
पुत्र रत्न इक घर आयेगा दावानल सा यश पायेगा
मस्त हस्त सम भ्रमण करेगा सुरज सम जग मे चमकेगा
बाबा की ऑखो का तारा सुरेन्द्र नाम लगता था प्यारा
गुरू पुष्प संघ जसपुर आया इस बालक का भाग्य जगाये
अदभुत प्रतिभा देखी तुझमे, ज्ञान योगी इक छिपा था तुझमे
पिता से तुमको माँग लिया था मात पिता ने सह़र्ष दिया था
तब अग्नी मे तुम्हें तपाया बारह वर्ष का समय बिताया
क्षमावाणी का शुभ दिन आया दीक्षा धारू ये था भाया
21सितंबर दिन पुण्यशाली होती गुरू की होती दीक्षा दिवाली
चहुं दिशि अंबर बने तुम्हारे वीतराग मुद्रा जब धारे
वाणी तेरी शीतल चंदन शीघ्र मिटाती मन का क्रंदन
जिस नगरी भी कदम बढाये अतिशय अपने खूब दिखाये
घर्म की ऐसी अलख जगायी संस्कार प्रणेता उपमा पायी
जेल मे जो उपदेश सुनाये मध माँस से लोग छुङाये
जब बच्चे उपदेश है सुनते शहद ब़्रेड व चमडा तजते
जिस नगरी भी किया चौमासा भक्तो के मन भर दी आशा
निर्बल तुझसे बल पा जाये वीराने हरियाली पाये।
जंगल मे मंगल करते हो संकट सारे तुम हरते हो।
जिस पर होती कृपा तुम्हारी उसकी तो किस्मत है संवारी
एक प्रेरणा तुमसे पायी सौरभाँचल की नींव धराई
सौरभाँचल इक तीरथ प्यारा नव जिन गृह का देख नजारा
वृहद आदि पदमासन प्रतिमा नीलाँबर का लगा चदोंवा
श्रुत स्कन्ध मंदिर बनवाया दाँदशाग का मान बढ़ाया
रत्न चौबीसी मन को भाये देख देख के ह्रदय हरसाये
सूनी थी हिसार की नशिया पर भू भीतर दबी थी निधिया
अपने ज्ञान ध्यान से जाना त्रय जिनदेवा भीतर जाना
हाथों से मिट्टी खुदवायी पार्श्व आदि वीरा छवि पायी
जयकारो से गगन गुजाये ज्ञान योगी गुरुदेव कहाये
मन हर पारस क्षेत्र कहाया सहृस कलश से नवहन कराया
जिस धरती पर कदम बढाये वो माटी चंदन बन जाये
घर घर ज्ञान के दीप जलाये अज्ञान तिमिर मन का हट जाये
दर्शन पा मन पुष्प खिला है वर्धमान सा दर्श मिला है
जब से तेरा साथ मिला है हम सब को भगवान मिला है।
"सौरभ सागर चालीसा मन जो भी धयाये
त्याग धर्म बढ़ता रहे गुरू अनुकम्पा पाये
गुरूवर तेरे चरण मे नमन हो बारंबार
पापो का क्षय हो मेरा भव से हो जाऊँ पार।"