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मुनि श्री सौरभ सागर जी महाराज का जीवन परिचय

Mar 02 2016
Posted by : Ashok Jain Indirapuram Ghaziabad

मुनि श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज का जन्म 22 अक्टूबर 1970 को नवगठित छत्तीसगढ़ प्रदेश के रायगढ़ जिले मे जसपुर नगर मे हुआ । पूर्व जन्म के संस्कार, प्रबल शुभ कर्मोदय से गुरु चरण सानिध्य मिलने से परम पूज्य आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज से प्रभावित होकर मात्र साढ़े बारह साल की छोटी सी आयु मे आजीवन गृह त्याग का संकल्प कर 8 अप्रैल 1983 को घर छोड़ दिया ।
आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने अपनी दिव्य- द्रष्टि से आपमे कुछ विलक्षणता देखी और आपकी बढ़ती वैराग्य भावना को देख सहज ही साढ़े पंद्रह वर्ष की लघु-वय मे छतरपुर ग्राम मे 17 जनवरी 1986 को क्षल्लक दीक्षा प्रदान कर दी ।
आपकी बढ़ती साधना एवं ज्ञान से राजस्थान की पवन धरा मे बागड़ प्रांत के बांसवाड़ा जिले के अंदेश्वर नमक पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र मे 27 जून 1986 को ऐल्लक दीक्षा ग्रहण कर की ।
सतत आठ वर्ष की कड़ी साधना के द्वारा जिनागम के रहस्यो को जानने, समझने एवं ह्रदय मे उतार गुरु आशीष की छाया मे अपनी प्रतिभा को निखारा । अंतत 29 सितंबर 1994 को उत्तरप्रदेश की धर्म नागरी इटावा मे आचार्य श्री ने आपको मुनि दीक्षा दी।
आचार्य श्री अपने ज्ञान- ध्यानी, सोम्य, शांत, मुनि को देखकर प्रसन्नचित रहते और अपने ही साथ उत्तरप्रदेश से नेपाल तक की यात्रा कराई ।
तदुपरान्त उन्होने 21 मई 1995 को यू.पी. के बाराबंकी नामक शहर से मंगलमय भरपूर आशीर्वाद प्रदान कर विदा किया । आपने धर्म प्रभावनार्थ मई-जून की भीषण गर्मी मे बांदा की और विहार किया और अपनी सूझबूझ से चारित्रिक निर्मलता से दो वर्ष की अल्पावधि मे ही बहूचर्चित हो गए।
आपने विश्व इतिहास की प्रथम घटना बांदा , शिवपुरी, आग्रा, अलीगढ़ जेल मे मंगल प्रवचन किए एवं लगभग 1600 कैदियो को मांस, अंडा, शराब आदि का त्याग कराया ।
गुरुदेव के पुनीत, पवन, पवित्र चरणों मे सादर नमन एवं नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु