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सरधना नगरी में प्रवचन

Feb 14 2017
Posted by : Ashok जैन Indirapuram

परम पूज्य संस्कार प्रणेता ज्ञानयोगी मुनि श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में सरधना नगर में प्रथम बार श्री दिगंबर जैन पदम प्रभु बड़ा मंदिर के प्रांगण में श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ 1 फरवरी को बड़ी धूमधाम के साथ किया गया पंडित संदीप जैन सजल शास्त्री हस्तिनापुर के विधानाचार्यत्व में किया जा रहा हैं । प्रथम दिवस में अनंतानंद सिद्ध परमेष्ठी भगवंतों की आराधना करते हुए आठ अर्घ्य मंडप पर समर्पित किए गए प्रात कालीन घटयात्रा, मंगल धर्म ध्वजारोहण,सकलीकरण, जाप अनुष्ठान, मंडप प्रतिष्ठा, इंद्र प्रतिष्ठा, अभिषेक एवं शांतिधारा करते महामंडल विधान किया गया
पूज्य गुरुदेव सौरभ सागर जी महाराज अपने वचनों के माध्यम से कहा कि यदि व्यक्ति को तीनों लोकों में सुख शांति और समृद्धि से रहना है तो उसे अपने जीवन में विकार और व्यसन को विसर्जित करना होगा जो व्यक्ति जीवन से व्यसन को विसर्जित कर देता है वह अमरता, दीर्घायु,स्थिरपद को प्राप्त करता है श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में सिद्धों की आराधना की गई है सिद्धो की आराधना करने का सौभाग्य भी उन्हीं को मिलता है जिनका पुण्य प्रबल हुआ करता है एक समय था जब सती मैना सुंदरी और श्रीपाल ले यह सिद्ध चक्र महामंडल विधान किया जिसका प्रताप हुआ की श्रीपाल सहित 700 कुड़ियों का कोड क्षण भर में ही दूर हो गया फिर हमारी भक्ति भी ऐसी ही होनी चाहिए कि हमारे कर्मों का नाश हो और हम भी सिद्ध अवस्था को प्राप्त करें ।

2nd day
परम् पूज्य मुनि श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज ने कहा कि -- सिद्धचक्र महामंडल विधान सर्वाधिक श्रद्धात्मक विधान है ।इस विधान मे शब्द ब्रह्म की आराधना की गई है। जिसमे प्रथम शब्द ही अर्हम कहा गया है जिसमे अ से लेकर ह तक के शब्द ब्रह्म से आराधना की गई है। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान ने सर्वप्रथम अपनी पुत्रियों ब्राह्मी और सुंदरी को अंक कला एवं अक्षर कला का ज्ञान दिया ।इसी कारण से आज भी ब्राह्मी लिपि सबसे प्राचीन मानी गई है । उन्होंने अपनी पुत्रियों को ज्ञान दिया की पृथ्वी और आसमान गोल है एवं जम्मूद्वीप के मध्य मे सुमेरु पर्वत है इसी आधार पर एक गोल एवं एक सुमेरु पर्वतवत है सीधा(खड़ा) है इन दोनों से ही समस्त अंक एवम समस्त अक्षरों की रचना की गई है।
आप सभी को अ से अरिहंत,आ से आचार्य ही पढ़ना चाहिए।
हिंदीं वर्णमाला अ से प्रारंभ होती है जिसमे अ से अनार पढ़ाया जाता और ज्ञ से ज्ञानी बनाया जाता है लेकिन अंग्रेजी मे A से APPLE (सेव) पढ़ाया जाता है और वो Z से ZEVRA(जेब्रा एक जानवर) बनाकर छोड़ता है।दोनों का प्रारंभ तो एक फल के साथ होता है लेकिन एक ज्ञानी और एक जानवर बना देती है। इसलिए भगवान ऋषभदेव द्वारा प्रतिपादित भाषा ही सर्वोत्कृष्ट है।

3 rd day
परम् पूज्य संस्कार प्रणेता ज्ञानयोगी मुनि श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज ने कहा कि---हर प्रश्न के उत्तर दो प्रकार के होते हैं एक शास्त्रानुसार एवं दूसरा मान्यतानुसार आज समाज मान्यतानुसार जी रहा है शास्त्रानुसार नहीं क्योंकि मान्यतानुसार को जीने के लिए भेजा चाहिए और शास्त्रानुसार जीने के लिए कलेजा चाहिए क्योंकि सत्य को पाने के लिए मजबूत कलेजा होना आवश्यक है आजकल कुछ लोग मान्यतानुसार जीने में विश्वास करते हैं एवं मंदिर में आकर धार्मिक क्रिया में पुन्य पाप की बात करके नरक स्वर्ग की बात कर अपना मत स्थापित करते हैं जो कि एक मिथ्या धारणा है कभी भी मिथ्या उपदेश नहीं देना चाहिए क्योंकि धार्मिक क्रिया करते समय पाप नहीं लगेगा क्योंकि उस समय ना तो हिंसा हो रही है ना झूठ बोला जा रहा है ना चोरी की जा रही है ना कुशील किया जा रहा है ना परिग्रह को बढ़ाया जा रहा है तो फिर पाप कैसा? इसलिए मान्यतानुसार जीने से अच्छा है शास्त्रों का अध्ययन करें और शास्त्रानुसार जीवन को धार्मिक बनाएं।

4th day
परमपूज्य गुरुदेव सौरव सागर जी ने प्रवचनों के माध्यम से कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन में पुरुषार्थ अवश्य करता रहना चाहिए पुरुषार्थ चार प्रकार के होते हैं धर,्म अर्थ ,काम, मोक्ष ,व्यक्ति को सिर्फ पुरुषार्थ पैसा कमाने के लिए नहीं करना चाहिए क्योंकि पैसों से बिस्तर तो खरीदा जा सकता है नींद नहीं खरीदी जा सकती ,पैसों से औषधि खरीदी जा सकती है निरोगी काया नहीं पाई जा सकती, पैसों से पुस्तकें खरीदी जा सकती हैं विद्या नहीं पाई जा सकती है ,इसलिए सिर्फ पैसा मत कमाओ जीवन में धर्म का अर्चन करो क्योंकि पूर्व का पुण्य हमारा इतना प्रबल था कि आज हमें जिन दर्शन जिन गुरुओं की आराधना जैन शास्त्र की वाचना करने का सौभाग्य मिला है भाग और पुरुषार्थ दोनों का समन्वय जरूरी है ना हम भाग्य के सहारे ही बैठ सकते हैं न पुरुषर्थ के, दोनों का साथ जरूरी है।

Vth day
परम पूज्य गुरुदेव सौरभ सागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों के माध्यम से कहा कि-- जब व्यक्ति का जन्म होता है तब उसके पास दो रास्ते होते हैं एक रास्ता प्रभुता का होता है और दूसरा रास्ता पशुता का होता है अब मनुष्य को निर्धारित करना होता है की उसे अपने जीवन को कैसा बनाना है यदि उसे अपना रास्ता प्रभुता वाला बनाना है तो उसके लिए उसे अपने जीवन में यम नियम संयम को धारण करना होगा एवं त्याग तपस्या के पर मार्ग पर चलना होगा तभी वह नर से नारायण बन सकता है और यदि मनुष्य को अपना जीवन पशुता की ओर ले जाना है तो वह अपना जीवन व्यसन कषाय पाप् दुर्गुण दुराचरण की ओर ले जाता है जिससे कि मनुष्य पर्याय में भी उसे पशुता का एहसास होने लगता है।

VIth day
पर पूज्य गूरुदेव सौरभ सागर जी महाराज ने कहा की -- जीवन में पूजा हि मत करते रहना पूज्य बनने की राह पर भी चलना क्योंकि जो पूज्य बनने की राह पर चलता है वह अनंत सुख को प्राप्त करता है और वह रास्ता संयम नियम साधना के द्वारा प्राप्त होता है जब व्यक्ति उस रास्ते पर अग्रसर हो जाता है तब वह दुनिया के सभी विकल्पों से मुक्त हो जाता है और वह उस मार्ग पर निरावाध रूप से बढ़ता जाता है आहार देते समय भी सोचो कि मैं आज देने वाला नहीं आहर लेने वाला भी बनु जीवन में 4 चीज बड़ी दुर्लभता से मिलती है मनुष्य पर्याय, श्रद्धा, संयम ,और निर्वाण इनको पाना है तो त्याग और साधना की पतवार पर ही सवार हो कर के मोक्ष रूपी लक्ष्मी को पाना है तो त्याग तपस्या जीवन में अपनाकर ही संभव है।

VIIth day
परम पूज्य गुरुदेव सौरभ सागर जी महाराज ने कहा की -- जीवन में पूजा हि मत करते रहना पूज्य बनने की राह पर भी चलना क्योंकि जो पूज्य बनने की राह पर चलता है वह अनंत सुख को प्राप्त करता है और वह रास्ता संयम नियम साधना के द्वारा प्राप्त होता है जब व्यक्ति उस रास्ते पर अग्रसर हो जाता है तब वह दुनिया के सभी विकल्पों से मुक्त हो जाता है और वह उस मार्ग पर निरावाध रूप से बढ़ता जाता है आहार देते समय भी सोचो कि मैं आज देने वाला नहीं आहर लेने वाला भी बनु जीवन में 4 चीज बड़ी दुर्लभता से मिलती है मनुष्य पर्याय, श्रद्धा, संयम ,और निर्वाण इनको पाना है तो त्याग और साधना की पतवार पर ही सवार हो कर के मोक्ष रूपी लक्ष्मी को पाना है तो त्याग तपस्या जीवन में अपनाकर ही संभव है।

VIIIth day
परम पूज्य गुरुदेव सौरभ सागर जी ने अपने प्रवचन के माध्यम से कहा की- व्यक्ति को जीवन मे धैर्यवान होना जरुरी है क्योकि जीवन मे परेशानिया चिंता करने से बड जाती है और चुप रहने से कम हो जाती है और धैर्य(सब्र) रखोगे तो कुछ समय के लिए गायब हो जायेगी।आज कल लोग सिर्फ दुख के दिनों मे भगवान को याद रखते है सुख के दिनों मे भूल जाते है। सबको ध्यान रखना चाहिए की कानून की निगाहों से बचा जा सकता है लेकिन कर्मो की निगाहों से नहीं।जिस काम को करते समय मन कापे तो सावधान हो जाना चाहिए। क्योंकि जब तक मन मे भय है तब तक सुधार की सम्भावना है लेकिन जब मन से भय निकल जाये तो सुधरने की कोई संभावना नही है।।

IXth day
परम पूज्य गुरुदेव सौरभ सागर जी ने अपने प्रवचन के माध्यम से कहा की-हमें विरासत मे क्या मिला ये महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्पूर्ण ये है कि हम भविष्य को क्या देकर जा रहे है।जो हमे मिला वो हमारा पूर्व का पुण्य था लेकिन जो हम भविष्य को देकर जायेंगे वह हमारा वर्तमान का पुरुषार्थ एवं संस्कार होंगे। व्यक्ति की पहचान उसके वैभव से नही बल्कि उसके संस्कारो से एवम उसके व्यवहार से होती है।इसलिए जीवन मे हमेसा सत्कार्य करते रहना चाहिए जिससे की हम भविष्य को एक धरोहर देकर जाये जिससे जैन धर्म की महती प्रभावना होती रहे।