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शामली में प्रवचन

Feb 28 2017
Posted by : Ashok Jain Indirapuram

आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य संस्कार प्रणेता ज्ञानयोगी मुनि श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज ने शामली में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि- अहिंसा शब्द नहीं संस्कृति है: जो जीवन की संपूर्ण विकृति को हटाकर प्रकृति के साथ चलने की प्रेरणा देती है। अहिंसा जैन संस्कृति का प्राण हैं। अहिंसा के अभाव में जैनत्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जैनाचार्य पूर्णरूपेण अहिंसामूलक है। जैन संस्कृति का संपूर्ण आचार,विचार, व्यवहार,आहिंसा की दूरी पर गतिमान है। अहिंसा की शिक्षा मां के दूध के साथ ही मिलती है और कहती है कि- हे प्राणी! तेरा जीवन दूध पर चलने योग्य है, खून पर नहीं।इसलिए एक शेरनी भी अपने जन्मजात बच्चे का पालन करती है तो सर्वप्रथम दुग्धपान कराती है, रक्त पान नहीं। वह दुग्ध-पान की पहली घुट्टी ही अहिंसा है।अहिंसा अंतश्चेतना का भाव है। संसार में जितने भी जीव हैं,एक दूसरे का उपकार करके ही जी सकते हैं,अपकार करके नहीं। इसलिए *तत्वार्थ सूत्र में कहा गया है- "परस्परोपग्रहो जीवानाम"* परस्पर एक जीव दूसरे जीव् का उपकार करते हैं ।शांति का उपाय परस्पर की सुरक्षा है ।अपने समान ही पर को मानने वाला ही परस्पर एक दूसरे की रक्षा कर सकता है। करुणा, दया ,मैत्री से भर सकता है अहिंसा से ओत पोत जीवन में अमृत की सरिता बहती है। अहिंसा की देवी जिसके दिल में विराजमान हो जाती है उसके मन, मुख, व् तन से प्रेम की बरसात होती है। वह प्रेम फिर मातृत्व की भांति अपनों पर ही नहीं सभी पर बरसने लगती है।