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जिज्ञासा समाधान १- मंगलम पुष्पदंताद्यो क्यों बोलते है गुरुवर सौरभ सागर जी ?

Apr 13 2017
Posted by : संदीप जैन पंडित जी

By Sandeep Jain Pandit Ji
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परम् पूज्य संस्कार प्रणेता ज्ञानयोगी मुनि श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज से मैंने कुछ जिज्ञासाएं की जिनका समाधान आप तक प्रेषित कर रहा हु आप सभी उन्हें ध्यान से पड़े और समझकर जागरूक हो.....
प्रश्न नं.:-01
आप "मंगलम पुष्पदंताद्यो" क्यों बोलते है
समाधान:-
महामन्त्र के जनक, लिपिबद्ध- कर्ता, धरसेनाचार्य के शिष्य , ऋषिसभा के अधिपति,भूतबलि स्वामी के ज्येष्ठ भ्राता, मोक्षमार्ग के कंटक विनासक,कुनय रूपी अंधकार को छाटने बाले, दिव्य केवलज्ञान की दिव्य वाणी को संरक्षित ,संवर्धित, समर्पित करने बाले,कलिकाल सर्वज्ञ, अंगधारक,भगवान महावीर स्वामी के लगभग 633 वर्ष पश्चात् हुए आचार्य भगवन पुष्पदंत स्वामी के स्मरण मे मंगलम पुष्पदंताद्योकहता हुआ कृतज्ञता अभिव्यक्त करता हु|
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प्रश्न नं.:-02
अगर आप षट्खंडागम की रचना के आधार पर "मंगलम पुष्पदंताद्यो" बोलते है तो आचार्य भूतबलि स्वामी का नाम क्यों नही बोलते?
समाधान :-
जो बड़े है उन्ही का नाम आता है जिन्होंने णमोकार मन्त्र का 'निवद्ध' मंगल किया उन्हें स्मरण करते है।
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प्रश्न:-03
अगर ऐसा सत्य है तो और साधू और विद्वान ,पंडित क्यों नही बोलते???
समाधान
सत्य को जानना अलग बात है,सत्य को स्वीकार करना अलग बात है,सत्य को जानने के लिए इतिहास का आध्ययन चाहिए,और सत्य को स्वीकारने के लिए पूर्वाग्रह से मुक्त होने का साहस चाहिए।
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प्रश्न नं.:-04
आप "मंगलम पुष्पदंताद्यो" बोलते है जिससे समाज पर गलत प्रभाव पड़ता है।
समाधान:-
गलत को सही करने पर समाज पर गलत प्रभाव नही पड़ता अपितु पूर्ण इतिहास व प्राचीनता का रूप न होने से जो धारणा चली आ रही है उसे मानने से दिगम्बर धर्म की ही मर्यादा और प्राचीनता नष्ट होती है,क्योकि श्वेताम्बर समाज "मंगलम स्थूलभद्राद्यो" कहती है, जो उनके विचार से धर्म के संस्थापक थे और आचार्य पुष्पदंत स्वामी एवम भूतबलि स्वामी जिनवाणी के संस्थापक एवम जनक थे।
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प्रश्न:-05
ऐसा करने से नए विवाद को जन्म देना है?
समाधान
जहाँ वास्तविक विषय पर संवाद नही है वही विवाद है स्याद्वाद को स्वीकारने वाला आगम के जन्मदाता के स्मरण को विवाद का विषय नही मानता।
प्रश्न नं.:-06
आप "मंगलम पुष्पदंताद्यो" बोलते है ! ऐसा करने से चोरी का दोष लगता है।?
समाधान:-
किसी की गिरी हुई, रखी हुई,पड़ी हुई,भूली हुई,वस्तु को उठाना चोरी है। किस आचार्य ने कब यह मंगलाचरण लिखा नाम व् ग्रन्थ की जानकारी हो जायेगी की यह मंगलाचरण उनका है तब कहा जा सकता है कि चोरी है। अन्यथा प्रमाण रहित पूर्वाग्रह होने से ऐसा महसूस हो रहा है कि "मंगलम पुष्पदंताद्यो" कहने से चोरी का दोष लगता है।
प्रश्न:-07
ऐसा करने से कषाय बढ़ती है?
सत्य को उजागर करने से कषाय नही बढ़ती अपितु छिपाने से एवम उजागर न करने से बढ़ती है।
जो नही है उसे कहने से मिथ्योपदेश का अतिचार भी लगता है,और गृहस्थों को झूठ बोलने का पाप भी और जानबूझ कर सत्य छिपाने से मायाचारी का दोष भी लगता है।
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प्रश्न नं.:-08
इससे धर्म या सम्यक्त्व नष्ट नही होगा लेकिन बात प्राचीनता की है?
समाधान
जब आप स्वीकार रहे है कि धर्म व् सम्यक्त्व नष्ट नही होगा।
प्राचीनता के लिए इतिहास पढ़िये, श्रुत पंचमी का पर्व किससे चला? परम्परागत महावीर भगवान अर्थकर्ता है,गौतम स्वामी ग्रन्थकर्ता है और पुष्पदंत स्वामी एवम भूतबलि स्वामी उपग्रंथकर्ता है।
उसी क्रम से वन्दना है,स्मरण है,उच्चारण है।
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प्रश्न:-09
इससे तो यह प्रतीत होता है कि आप कुन्दकुन्द स्वामी की विनय नही करते?
समाधान
इसका मतलब यह हुआ की आप भी षट्खंडागम ग्रन्थ के रचयिता की विनय नही करते।
प्रश्न:-10
आप पूर्वाचार्यो की परंपरा को क्यों नही अपनाते?
समाधान
"मंगलम पुष्पदंताद्यो" बोलते ही आद्यो अर्थात आदि से अर्थात प्रारम्भ मे हुए आचार्य का ही स्मरण किया। क्या पूर्वाचार्यो मे षट्खंडागम के रचयिता आचार्य पुष्पदंत स्वामी नही है? "मंगलम पुष्पदंताद्यो" बोलते ही आदि मे अर्थात प्रारम्भ मे हुए आचार्य पुष्पदंत स्वामी का ही स्मरण किया गया है जिसे आचार्य वीरसेन स्वामी ने कहा है:- अर्थकर्ता वर्धमान भट्टारक है,ग्रंथकर्ता गौतम गणधर है, उपग्रन्थ कर्ता आचार्य पुष्पदंत भूतबलि है।
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प्रश्न:-11
कही आपके मन में मायाचारी तो नही की अपने गुरु का नाम लिया जाय?
समाधान
मेरे गुरु वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज के शिष्य पुष्पगिरी प्रणेता-सर्वतोभद्र विहारी आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज है जिसे इस बात का ज्ञान है फिर भी यह सोचे कि मैं अपने गुरु का नाम माया से लेता हूं तो वह अपनी सरलता ,विनम्रता,वुद्धिमत्ता को छिपाने अपनी सोच को दूसरे की सोच समझता है इसलिए नाम की समानता माया नही आपकी स्मृति की छाया है,क्योकि "जाकी रही भावना जैसी ,शब्द अर्थ को सोचे वैसी"
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प्रश्न:-12
अगर आप सही है तो आप की बात अभी तक किसी भी विद्वान ने क्यो नही मानी?
समाधान
हो सकता है विद्वानों को प्राचीन इतिहास का परिपूर्ण ज्ञान न हो या पूर्वाग्रह से ग्रसित हो या भीड़ की मान्यता में इस सत्य को स्वीकारने में उन्हें आर्थिक नुकसान ,सामाजिक सम्मान नही मिलेगा इसका भय हो इसलिए वे इस सत्य को नही स्वीकर पा रहे और मैने तो 15 विद्वत गोष्ठियां करवाई है 15 से 100 विद्वान तक आये है कई की जिज्ञासा जागी प्रतिप्रश्न नही कर सके। भीतर से इस सत्य को मानते है पर साहस की कमी है वे जानते है इस वाक्य को बोलने से चर्चा करने से ओर भी रहस्य खुलेंगे भीतर का ईमानदार मन आगे बढ़ता है पर बाहर का स्पष्ट रूप फिलहाल सामने नही आया इंतज़ार कीजिये विचार विमर्श के बाद निष्कर्ष भी आयेगा।
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प्रश्न:-13
जब बड़े आचार्य यहां तक कि आपके दीक्षा गुरु स्वयम कुन्दकुदाद्यो बोलते है,तो आप क्यो नही बोलते?
समाधान
थॉमस एडिसन ने बल्ब का तो आविष्कार किया उसके चाचा,ताऊ,पिता,मित्र ने तो नही किया, तो क्या एडिसन का यह आविष्कार उनके चाचा ,ताऊ के ना करने के कारण गलत सिद्ध नही होता। अपितु उस ओर ध्यान नही गया।
अन्य आचार्य ,साधु, विद्वान, का ध्यान नही गया अब गया है तो इस सत्य विचार पर मंथन चल रहा है। नवनीत तो दूध से निकलेगा तेल या पानी से नही। सत्य तो प्राचीन प्रमाण से निकलेगा धारणा से या उपेक्षा से नही।
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प्रश्न:-14
तो फिर आप किसी अन्य आचार्य का नाम क्यो नही लेते?
समाधान
जिनके द्वारा लिखित णमोकार मंत्र के लिए विगत 2000 वर्ष से समस्त दिगम्बर,श्वेताम्बर,स्थानकवासी,तेरापंथी,तारण पंथी,कहान पंथी सभी आम्नाय एक साथ एक मत से मानते है कि-
ऐसो पंच णमोयारो, सव्व पवप्पणासणों
मंगलाणं च सव्वेसिं,पढमं होई मंगलम
यह णमोकार मन्त्र सब पापो का नाश करने बाला है और सब मंगलो में प्रथम मंगल है।
जिसकी प्रथम लेखनी से निःसृत वाक्य इतना प्रभावशाली है, सर्वमान्य है ,जिसमे अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठी,तीन काम नौ करोड़ मुनिराज,समस्त द्वादशांग का स्मरण है ,जिन आचार्य के बारे में ना संशय है ना विभ्रम है ना अनध्यवसाय है जिन्होंने उस वक्त भी ऋषिसभा के अधिपति पद का सम्मान पाया है जिनकी गौरव गरिमा कहने में सब असमर्थ है ऐसे श्रुत शब्द को शब्द श्रुत में प्रगट करने वाले आचार्य श्री पुष्पदंत स्वामी का नाम "मंगलम पुष्पदंताद्यो" के रूप मे लेता हूं। लेखक की अस्वीकृति लेख की स्वीकृति पर भी संशय उत्पन्न कर सकता है,जो गुनाह है,पापवर्धक है।
इसलिए ऐसे महान आचार्य का स्मरण करना भला कौन निकट भव्य जीव नही चाहेगा।
प्रश्न:-15
5 नामधारी भगवान महावीर स्वामी के पश्चात 5 नामो से जाने वाले मात्र कुन्दकुन्द आचार्य ही हुए है ,पुष्पदंताचार्य का एक ही नाम है? कुछ महिमा होगी तभी 5 नामो से जाने गए।
समाधान
नाम 1 हो या 5 हो या 1008, नाम से कोई फर्क नही पड़ता। नाम के अनुरूप गुण हो तो नाम की महिमा बड़ जाती है,भगवान महावीर स्वामी के दो नाम ज्ञानात्मक है,दो नाम साहसात्मक है,एक नाम जन्मात्मक है जो महिमा ,गरिमा सार्थकता से परिपूर्ण है,महामन्त्र प्रदाता पुष्पदंताचार्य का दैविक शक्ति का जागरण परिवर्तन से प्रगटा ,धरसेनाचार्य द्वारा प्रदत्त गुणात्मक नाम ही "श्री पुष्पदंताचार्य" है।
कुन्दकुन्दाचार्य के नाम मे प्रश्न वाचक विचार है?
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प्रश्न:-16
किस नाम पर क्या प्रश्न वाचक विचार है?
समाधान
आप नाम और कारण बताइये?
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प्रश्न:-17
उनका प्रसिद्ध नाम ही कुन्दकुन्द है,इस पर क्या प्रश्न वाचक विचार है?
समाधान
गुरु द्वारा प्रदत्त नाम है या जन्म स्थान की पहचान है?
कुंडकुंदपुर से उनकी पहचान प्रसिद्ध नाम कुन्दकुन्द पड़ा, पर श्री पुष्पदंताचार्य किसी ग्राम की सीमा से नही पहचाने जाते अपितु षट्खंडागम के रचयिता एवम णमोकार मन्त्र के लेखक के नाम से प्रसिद्ध है।
आप व्यवहारिकता से से विचार करे तो लगेगा कि यदि साधु के नाम से ग्राम का नाम रखा जाए यह महानता प्रगट करती है,ग्राम के नाम से साधु का नाम पहचाना जाता है तो यह सीमित दायरा का द्योतक है, वर्तमान मे शांतिसागर जी के नाम से कई आचार्य हुए तो ग्राम की सीमा बांध दी "दक्षिण बाले", "छाणी बाले", "हस्तिनापुर बाले", स्थान के नाम से पहचान श्रेष्ठता को दर्शाती है या चरित्र चक्रवर्ती से शांतिसागर जी की पहचान की महत्ता झलकती
प्रश्न:-18
पूज्य गुरुदेव! इतनी गहराई से तो मैंने कभी नही सोचाऔर न ही कभी किसी विद्वान से या संतो से ऐसी बात सुनी ,अब तो दूसरे नाम के बारे में भी पूछकर डर सा लग रहा है? आपके इतिहास का ज्ञान-दूरदृष्टि-तद् विषयक- खोजपूर्ण चिंतन मुझे सोचने को मजबूर कर रहा है ,दूसरा नाम वक्रग्रीवाचार्य है,क्या इस नाम पर भी प्रश्न वाचक विचार है?
समाधान
प्रतिप्रश्न
आप ही बताये कि यह नाम किस कारण से पड़ा?
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प्रश्न:-19
पूर्व में विद्वानों से संतो से सुना है,किताबो में पड़ा है कि -
वे सामायिक के समय स्वाध्याय कर रहे थे जिस कारण से गर्दन टेढ़ी हो गई इसलिए या वे अत्यधिक लिखते और पढ़ते थे इसलिए गर्दन टेढ़ी हो गई
इसलिए उनका एक नाम वक्रग्रीवाचार्य कहने लगे,आप ही बताये समाधान करें?
समाधान
पंडित जी बुरा मत मानना! यह नाम सम्मान बर्धक है या व्यंगकारक? सम्मान की ऊँचाई में नाम की इतनी गिरावट प्रवचनसार,नियमसार ग्रंथ के लेखक को इतना भी ज्ञान नही था कि स्वाध्याय कब करना और सामायिक कब करना चाहिए? वर्तमान मे ऐसा साधु मिल जाये जिसे स्वाध्याय और सामायिक के समय का ज्ञान न हो तो आपकी क्या भावना होगी उनके प्रति?
आप दिक्षा लेने वाले को ही नही दीक्षा दाता को भी अज्ञानी कहोगे की इतना भी ज्ञान नही दीक्षा दाता को किसे दीक्षा दी है? सिर्फ शिष्य की संख्या बढ़ाने के लिए किसी को भी दीक्षा दे दी।
आपने तो यह वक्रग्रीवाचार्य नाम प्रचलित कर गुरु और शिष्य दोनों को अपमानित किया है और मैं आपसे ही पूछना चाहता हु कि- कदाचित कोई साधु विहार कर रहे है और एक्सीडेंट से एक पाव टूट जाये,कट जाये तो क्या आप उन्हें "लंगडाचार्य" के नाम से पुकारेंगे? दुर्भाग्य वशात एक आंख चली जाये तो क्या उन्हें "कानाचार्य" पुकारेंगे?
एक हाथ कट जाये तो क्या उसे "टुंडाचार्य" पुकारेंगे?
क्या ये शब्द सम्मान जनक है? एक साधु के सम्मान में? उपाधिया नाम के अनुरूप है? विचार करे!
ऐसी धारणा विद्वान और संतो को भी है वे क्या वास्तविकता को जानते नही या मानते नही? आप सोचे,समझे आपको "मंगलम पुष्पदंताद्यो" से कुन्दकुन्दाचार्य की उपेक्षा नजर आती है? या टेढ़ी गर्दन वाला वक्रग्रीवाचार्य कहकर गौरव का एहसास कर रहे है? पूर्वाग्रह से मुक्त होकर ठंडे दिमाग से सोचो सब सत्य समझ आएगा।
प्रश्न:-20
हे गुरुदेव! क्या इतनी बातो की जानकारी अब तक किसी आचार्य, उपाध्याय, साधू, आर्यिका, विद्वान को नही थी या अनभिज्ञ बने रहे या आंखे बंद करके एक के पीछे एक चलते रहे?
समाधान
ये तो आप उनसे ही पुछये/ जानिये/प्रतिक्रिया लीजिये।
अगर मेरे विचार गलत है तो जानकारी दीजिये अगर विचार विचारणीय है,सत्य है तो पवित्र मन से विचार करे, मुझसे नफरत ना करे, पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सोचे, मैं णमोकार मंत्र एवम ग्रन्थ के जनक आचार्य के सम्मान में "मंगलम पुष्पदंताद्यो" बोलता हूं जो शत-प्रतिशत सही है पर हमारी मानसिकता व पूर्वाग्रह इसे बोलने से,लिखने से रोकती है।
नफ़रत मत करना हमसे हमे बुरा लगेगा
बस प्यार से कह देना हमे यह सच स्वीकार नही
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प्रश्न:-21
महाराज श्री- चलिए मान लेते है कि आपके दीक्षा गुरुदेव का नाम आचार्य पुष्पदंत सागर है,इसलिए हमें संशय होता है पर आप "मंगलम पुष्पदंताद्यो" कब से बोलते हो और बोलने को क्यो मजबूर हुए?
समाधान
पंडित जी इतिहास जानकर क्या करोगे? समयसार की आढ़ में कुन्दकुन्दाचार्य के नाम पर एकांत वादियों का प्रचार जोरो से किया था एक रथ भी निकला था, प्रथम वर्षायोग स्थली पर जब रथ आया मैने सहज भावो से "मंगलम पुष्पदंताद्यो" बोला उस समय उनकी निगाहे -हाव भाव कुछ अलग हुए, मुझसे चर्चा की, कई बातें हुईं,फिर हर जगह पर यह मंगलाचरण प्रवचन का प्रथम रूप बना लिया,नाम लेते ही प्रश्न उठते है और कई कुधारणाओ पर प्रहार का यह एक सूत्र बन गया,आज जो मेरे निकट आकर सुनता है,पूछता है,समझता है,तो कहता है- महाराज आप कह तो सही रहे हो पर जो चला आ रहा है वही बोलो तो आपका ग्राफ और अधिक बढेगा, पर 22वर्षो से ही बोल रहा हु, सभी जगह बात आती है समाधान करता हु,सच को जानकर लोग चुप हो जाते है ,मेरे प्रश्नों का उत्तर आज तक कोई नही ढूंढ पाया ।
यह श्लोक किसने कब लिखा कही
" मंगलम भगवान विष्णु,मंगलम गरुडध्वजः"
"मंगलम पुण्डरीकाक्षाय, मंगलाय तनोहरी"
का बदला हुआ रूप तो नही है? प्रमाणिकता की तलाश में हु अन्यथा वीरसेनाचार्य द्वारा प्रामाणिक भगवान महावीर स्वामी के बाद गौतम स्वामी और फिर पुष्पदंताचार्य का नाम श्रेष्ठ है।
क्योकि गौतम स्वामी के बाद निबद्ध मंगलाचरण णमोकार मंत्र के साथ ग्रंथ लेखन कर्ता श्री पुष्पदंताचार्य ही है इसे कोई किसी भी इतिहास से नही हटा सकता। इनके पश्चात ही ग्रंथ लेखन की वह सुव्यवस्थित परम्परा चली।